घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
पी गया आंसू, जो अग्नि ना बुझी तो विष पिये
प्यासी निगाहें दौड़ती, क्या ढूँढ़ लाने के लिये
ढीठ सी दिखती, कभी तो मुंह मुझसे मोड़ती
चिलचिलाती धूप में भी, क्यों न पीछा छोड़ती ?
धधकती इस आंच में, तड़पा गई मुझको यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
सुनसान राहों में नजर डाली तुझे ढूँढ़ा किये
मिलन हो इस लालसा में, दाग दामन पर लिये
क्यों सताया रूप ने, निर्मम हुई मन की व्यथा
शापित हुई, लज्जित हुई है प्यार की पूरी कथा
हँस के शरमाई, मैं समझा प्रेम की देवी यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
जीत सूने मौन की, संगीत पर ऐसे हुई
दुराशा तेरी न जाने, फलित क्यों कैसे हुई
दुख से बोझिल मन हुआ है, देह जर्जर प्रेम बिन
बोल तेरे याद आये, ख्याल आये रात दिन
नागिन कहूँ, छलना कहूँ, तू लूट लेती है जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
-हरिहर झा
Her Teasing Face :
http://www.poetry.com/dotnet/P8989404/999/4/display.aspx
http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/
एक युग था
कवि
कविता क्या लिखता था !
भावों को व्यक्त करता था
संवेदनशील मन से
पीड़ा को मथता
तब गंगोत्री से
कविता की धारा बहती
भावनाओं का संचार
फलीभूत होता था
अब गये
पतवार चलाने के दिन
चरखा कातते थे गांधी बाबा
गये चरखे के दिन
अब अन्धाधुन्ध कारखानो से
निकलती कपड़ों की थान
देखो कम्प्यूटर पर
दर्जन कविता की शान
अब कवि लिखेंगे सोफ्टवेयर
सोफ्टवेयर लिखेगा कविता
धड़ाधड़ ले लो
कविता-सविता
भावों और शब्दों की खिचड़ी बना कर
खायेंगे चटखारे लेकर
हिंसक और
विभत्स
आई सी चिप्स से निकलते रस
उल्टी करते रस ;
फड़फड़ा उठेगें
राइम और रिथम
शब्दों को बिलोते औजार
नोचेंगे शैली का जिस्म
अब कवि की क्या बिसात !
कम्प्यूटर कविता लिखेंगे
लेपटोप तालियां बजायेंगे ।
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/07/blog-post_04.html
For “Hobbits disappeared!” and other poems :
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=53
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे
खुशियों की बौछार भले बाजी जीते या हारे
सांकल स्वर्ग द्वार पर लटकी ललक हुई हम तोड़ें
खुशियां अश्कों में प्रतिबिम्बित़ इन्द्रधनुष हम जोड़ें
अन्धेरे को धमकाता जब मोम संभल ना पाया
प्रेम धार ले दीपक ने तब ज्योति-पुंज बरसाया
सुख में डूबे, खूब नहाये बौछारों के मारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे
अन्तर्ध्यान हुये कर्कश सुर शुरु हैं कलरव गान
बोझिल भृकुटि ढीली पड़ गई फिसल पड़ी मुस्कान
“होगा प्रलय, मचे तबाही” डरा लिये सब झाँसे
गुम हुई बेदर्दी आवाजें घबराहट की साँसें
चिल्लाहट लो मौन हो गई शून्य हुये सब नारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे
तितली झूमे पंख लिये आमन्त्रण शिशु भावों को
दर्द मिट गये ऐसे मलहम लगते सब घावों को
शत्रु बन गये मित्र आ बसे ह्दय की बस्ती में
अमृत विष के भेद मिट गये मगन भये मस्ती में
मृदुजल कलश संजो कर रखे पी गये सागर खारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे
-हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/06/blog-post_20.html
A Spiritual Feel !
http://poetry.com/dotnet/P7382407/999/42/display.aspx
सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक
लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक
हेरी पोटर देख-देख सर्पीली तेज हवा चली
फैल गया दंश लहू में गोरे तक, काले तक
झेलते रहे भिड़न्त इस दुनियां के खेल में
तो गेंद देखो आ पहुंची दुश्मन के पाले तक
खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक
फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक
दरवाजे पे गमगीन हुये गोता हमने यूं खाया
कि चाबी पंहुच ही गई लटकते ताले तक
-हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/blog-post_02.html
For “The weather” :
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=33
मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल
नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में
हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में
अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन
गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से
इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन
जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार
अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया
दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”
( क्रमश: )