हरिहर झा

October 1, 2008

कौन सही? कौन गलत?

लावारिस हवाओं की थपेड़े खाती गर्द में
लोटपोट होता
बेशर्म मौसम का सरकता पल्लु
अब विलुप्त हुआ लजाती दुल्हन का रूप
और लहलहाती फसल का समां
गया वो भीनी भीनी हवाओं का
संगीत - सुरमय ।

अब अंगूरी खेतों की रखवाली करते
लपलपाते कुत्तों की बेताब आत्मा
हड्डी से भूख बढ़ा कर
खेल रही
मांस नोचने का खेल
दातों से चबा कर
मासूमियत को
उदर के हवाले करती ।

इधर सूअर के बच्चों से सीखते
हलाहल में अमृत तलाशते जीव
बदबू के साथ साथ
बदबू फैलाने का इल्जाम भी
ढो रहे हैं
इधर देख लो
खुद ही गवाही देकर
अपना निर्णय सुनाने को
एकत्र हुये असंख्य गजराज
जिनकी पवित्र वाणी पर
कीचड़ उछालते
दलदल में से उभरते
कीड़ों का उफान !
जो कुलबुला कर
महज गन्दगी फैंकते हैं
साफ सुथरी नाक में एकत्र हुई
घ्राण शक्ति पर !

इसमें कौन सही? कौन गलत?
खुद देख लो
चांदी की डंडी वाले तराजू में
जहां मुर्दा लाश पड़ी
शब्दों की हर पंक्ति का पलड़ा
जीवन्त शिशु से भारी ।

-हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/08/blog-post.html

http://poetry.com/Publications/search.asp?First=harihar&Last=jha&submit.x=30&submit.y=11
http://boloji.com/writers/hariharraijha.htm
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http://www.kritya.in/0201/En/poetry_at_our_time11.html

September 15, 2008

छलना!

Filed under: गीत, मंच, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:14 am
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घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

पी गया आंसू, जो अग्नि ना बुझी तो विष पिये
प्यासी निगाहें दौड़ती, क्या ढूँढ़ लाने के लिये
ढीठ सी दिखती, कभी तो मुंह मुझसे मोड़ती
चिलचिलाती धूप में भी, क्यों न पीछा छोड़ती ?

धधकती इस आंच में, तड़पा गई मुझको यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

सुनसान राहों में नजर डाली तुझे ढूँढ़ा किये
मिलन हो इस लालसा में, दाग दामन पर लिये
क्यों सताया रूप ने, निर्मम हुई मन की व्यथा
शापित हुई, लज्जित हुई है प्यार की पूरी कथा

हँस के शरमाई, मैं समझा प्रेम की देवी यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

जीत सूने मौन की, संगीत पर ऐसे हुई
दुराशा तेरी न जाने, फलित क्यों कैसे हुई
दुख से बोझिल मन हुआ है, देह जर्जर प्रेम बिन
बोल तेरे याद आये, ख्याल आये रात दिन

नागिन कहूँ, छलना कहूँ, तू लूट लेती है जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?

-हरिहर झा

Her Teasing Face :

http://www.poetry.com/dotnet/P8989404/999/4/display.aspx

http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

September 1, 2008

कम्प्यूटर कविता लिखेंगे!

एक युग था
कवि
कविता क्या लिखता था !
भावों को व्यक्त करता था
संवेदनशील मन से
पीड़ा को मथता
तब गंगोत्री से
कविता की धारा बहती
भावनाओं का संचार
फलीभूत होता था

अब गये
पतवार चलाने के दिन
चरखा कातते थे गांधी बाबा
गये चरखे के दिन
अब अन्धाधुन्ध कारखानो से
निकलती कपड़ों की थान
देखो कम्प्यूटर पर
दर्जन कविता की शान

अब कवि लिखेंगे सोफ्टवेयर
सोफ्टवेयर लिखेगा कविता
धड़ाधड़ ले लो
कविता-सविता
भावों और शब्दों की खिचड़ी बना कर
खायेंगे चटखारे लेकर
हिंसक और
विभत्स
आई सी चिप्स से निकलते रस
उल्टी करते रस ;
फड़फड़ा उठेगें
राइम और रिथम
शब्दों को बिलोते औजार
नोचेंगे शैली का जिस्म
अब कवि की क्या बिसात !
कम्प्यूटर कविता लिखेंगे
लेपटोप तालियां बजायेंगे ।

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/07/blog-post_04.html
For “Hobbits disappeared!” and other poems :
 
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=53

August 15, 2008

भीग गया मन

Filed under: गीत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:11 am
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भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे
खुशियों की बौछार भले बाजी जीते या हारे

सांकल स्वर्ग द्वार पर लटकी ललक हुई हम तोड़ें
खुशियां अश्कों में प्रतिबिम्बित़ इन्द्रधनुष हम जोड़ें
अन्धेरे को धमकाता जब मोम संभल ना पाया
प्रेम धार ले दीपक ने तब ज्योति-पुंज बरसाया

सुख में डूबे, खूब नहाये बौछारों के मारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे

अन्तर्ध्यान हुये कर्कश सुर शुरु हैं कलरव गान
बोझिल भृकुटि ढीली पड़ गई फिसल पड़ी मुस्कान
“होगा प्रलय, मचे तबाही” डरा लिये सब झाँसे
गुम हुई बेदर्दी आवाजें घबराहट की साँसें

चिल्लाहट लो मौन हो गई शून्य हुये सब नारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे

तितली झूमे पंख लिये आमन्त्रण शिशु भावों को
दर्द मिट गये ऐसे मलहम लगते सब घावों को
शत्रु बन गये मित्र आ बसे ह्दय की बस्ती में
अमृत विष के भेद मिट गये मगन भये मस्ती में

मृदुजल कलश संजो कर रखे पी गये सागर खारे
भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे

-हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/06/blog-post_20.html

 

A Spiritual Feel !

http://poetry.com/dotnet/P7382407/999/42/display.aspx

August 1, 2008

डर

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:16 am
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बड़ा ख्याल रखा
डर डर कर कि
तुम्हारी निरव वाणी के
सन्नाटे से मेरी
मुरझाई चेतना का संतुलन न बिगड़े
गीर न पड़ूं धम से
पर तुम्हारी निश्छल हंसी का
क्या भरोसा
जाने कब अपना दायरा भूल कर
छेड़ दे कोमल तन्तु
उजागर कर दे
उलझे अरमान
और बिखरी तमन्नायें …
अन्तस का पिघलता लावा
आंखों में उभार दे
इसलिये तो
जीवन को
स्वार्थी प्यार से
कस कर हथेली से दबाये
रोके रखा
डर बैठाया मन पर कि
क्या होगा अगर
सचमुच मैं मर गया तो ?
मेरी अकड़ और अहं का टूटना
या कि किताबी भाषा में … आत्मा का मिलन…
इससे तो बेहतर
क्यों न जी लें
हम अलग अलग शरीर में ।

            -हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html

 

सृजनगाथा में

http://www.srijangatha.com/2008-09/august/kavita-%20harihar%20jha.htm

Hunger And Gloom
http://poetry.com/dotnet/P8989404/999/2/display.aspx 

 

 

July 15, 2008

बाबरी

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:36 am
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प्रपंच किया कुछ सिरफिरों ने
रजनी को दिया नाम उषा
किताबी फूलों से भर ली मंजूषा
जिसमें कौओं ने कांव कांव कर पत्थर डाले
असमंजस में पड़ा नादान इंसान
डूबता रहा आस्थाओं में
भंवर में फंसता रहा

एक धरोहर खड़ी हुई मिथ्या की नीव पर
जिसके नीचे
शवदाह में दबी अस्थियां
इतिहासकारों की परिकल्पना को सहलाती रही
जो जीवित होना चाहते थे
नासमझी पर रोना चाहते थे
ऐसे चमकीले दांत और अस्थियों के अवशेष
जिन्हें फूंक मार कर जिन्दा करने को
लालायित थे तांत्रिक
पर क्रुद्ध मौत के समक्ष जीवन की हार
हुई सिर फुटौवल
खुद ही घंटी बजाता खतरे का निशान
हत्या हुई बलिदान
लो फिर एक कुनामी
बन कर आई सुनामी ।

-हरिहर झा

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July 1, 2008

कविते !

Filed under: अतुकांत, व्यंग्य, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:36 am

हिमालय !
तू बह जा
इमारत !
तू ढह जा
गंगे !
तू बह जा
ऐसे ही
पांच सात
अटपटे
चटपटे
रसीले
मधुभरे
वाक्य मिल कर
कविते !
तू बन जा

- हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/20-1.html#harihar

For “Agony churns my heart” and other 50 poems by further click on the bottom:

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=1

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June 17, 2008

उजाले तक

Filed under: हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:46 am
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सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक

लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक

हेरी पोटर देख-देख सर्पीली तेज हवा चली
फैल गया दंश लहू में गोरे तक, काले तक

झेलते रहे भिड़न्त इस दुनियां के खेल में
तो गेंद देखो आ पहुंची दुश्मन के पाले तक

खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक

फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक

दरवाजे पे गमगीन हुये गोता हमने यूं खाया
कि चाबी पंहुच ही गई लटकते ताले तक

-हरिहर झा

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For “The weather” :

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June 1, 2008

आश्वासन

मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल

नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में

हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में

अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन

गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से

इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन

जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार

अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया

दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”

( क्रमश: )

आश्वासन 2

( पिछ्ली कविता का शेष )

चित्रगुप्त ने जवाब दिया
हँसते हुये -
“कैसा स्वर्ग मत्रींजी ! याद कीजिये आपने
देश के गद्दारो के साथ
पकाई खिचड़ी
आपको तो कुम्भीपाक में पकाया जायगा
आपने जनता से किये थे झूठे वादे
दिये थे आश्वासन
बदले मे यह नरक - स्वर्ग से उल्टा
स्वर्ग का शिर्षासन है
और ये मेनका-उर्वशी की छवियां
स्वर्ग का आश्वासन है ।

- हरिहर झा

- हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html

“Who is wrong” and other 50 poems by further click:

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=56

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